
आज यानि 1 अप्रैल से चैती छठ का आगमन हो चूका है और आज नहाये खाये है तो चलिए आज हम छठ के बारे में जानते है भारत में त्योहारों की एक अनोखी परंपरा रही है, जहाँ हर पर्व एक विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व रखता है। ऐसा ही एक पवित्र और विशेष पर्व है चैती छठ, जिसे सूर्य उपासना के लिए जाना जाता है। यह त्योहार विशेष रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व में भगवान सूर्य की पूजा कर आरोग्यता, समृद्धि और संतान सुख की कामना की जाती है।
छठ पर्व की उत्पत्ति को लेकर कई कथाएँ प्रचलित हैं। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में द्रौपदी और पांडवों ने भी सूर्यदेव की उपासना कर अपने कष्टों से मुक्ति पाई थी। इसके अलावा, एक अन्य कथा के अनुसार, राजा प्रियव्रत और उनकी पत्नी मालिनी को संतान सुख प्राप्ति के लिए यह व्रत करने का आशीर्वाद मिला था।
छठ पूजा की सबसे अनोखी बात यह है कि इसमें न तो कोई मूर्ति पूजा होती है और न ही किसी विशेष देवालय की आवश्यकता पड़ती है। इसे सूर्य देव और छठी मईया की पूजा के रूप में मनाया जाता है, जो प्रकृति के प्रति समर्पण का प्रतीक है।
छठ पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है – एक बार कार्तिक मास में (कार्तिक छठ) और दूसरी बार चैत्र मास में (चैती छठ)। चैती छठ विशेष रूप से वसंत ऋतु में मनाया जाता है, जब प्रकृति अपनी नयी छटा बिखेरती है और वातावरण भक्तिमय हो जाता है। इस पर्व में चार दिवसीय कठिन व्रत रखा जाता है, जिसे पूरी निष्ठा और पवित्रता के साथ किया जाता है।
छठ का पहला दिन – नहाय-खाय होता है
इस दिन व्रती गंगा, यमुना या किसी पवित्र नदी में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है, जिसमें चने की दाल, लौकी की सब्जी और चावल प्रमुख होते हैं।
इस दिन का उद्देश्य शरीर और आत्मा की शुद्धि करना होता है। लोग अपने घरों को साफ-सुथरा रखते हैं और पूरी श्रद्धा से इस व्रत की शुरुआत करते हैं।
दूसरा दिन – खरना होता है
खरना के दिन पूरे दिन निर्जला उपवास रखा जाता है और शाम को गुड़ की खीर, रोटी और फल का सेवन कर व्रतधारी ऊर्जा प्राप्त करते हैं। इस दिन का विशेष महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि यह दिन आत्मसंयम और तपस्या को दर्शाता है।
व्रती इस दिन से और भी कठोर अनुशासन का पालन करते हैं और परिवार जन भी इस पवित्र कार्य में सहयोग देते हैं।
तीसरा दिन – संध्या अर्घ्य होता है
इस दिन व्रती डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। परिवार जन और श्रद्धालु गंगा घाटों या तालाबों पर एकत्र होते हैं, जहाँ वे सूर्यदेव की आराधना कर दूध और जल से अर्घ्य देते हैं। इस अवसर पर पूरे वातावरण में भक्ति भाव और श्रद्धा का माहौल रहता है।
महिलाएँ और पुरुष पारंपरिक वस्त्र धारण कर, सूप में फल, गन्ना, ठेकुआ और नारियल रखकर सूर्यदेव को अर्पित करते हैं। यह क्षण अत्यंत पवित्र माना जाता है।
चौथा दिन – उषा अर्घ्य होता है
इस दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। यह छठ पूजा का सबसे पवित्र और महत्त्वपूर्ण क्षण होता है। व्रती पानी में खड़े होकर सूर्य को जल अर्पण करते हैं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। इसके पश्चात व्रत का समापन किया जाता है।
इस दौरान छठ गीत गाए जाते हैं, जिनमें छठी मईया की महिमा और सूर्य देव के प्रति आस्था प्रकट की जाती है। यह पूजा पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देती है।
वही छठ पर्व के दौरान लोकगीतों का विशेष महत्त्व होता है। ये गीत आमतौर पर मैथिली, भोजपुरी और मगही भाषा में गाए जाते हैं। कुछ प्रसिद्ध छठ गीत हैं:जैसे की
कांच ही बांस के बहंगिया, बहँगी लचकत जाय’
‘उग हो सूरज देव, भइल अरघ के बेर’
‘
पटना के घाटे पे, छठी मैया आयेली’
ये गीत पूरे माहौल को आध्यात्मिक बना देते हैं और भक्ति भाव से भर देते हैं।
छठ पूजा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं। इस व्रत के दौरान उपवास रखने से शरीर की शुद्धि होती है और सूर्य के प्रकाश में रहने से शरीर को ऊर्जा मिलती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सूर्योपासना से मनोबल और आत्मशक्ति में वृद्धि होती है।
इस पूजा का एक और सइंटिफ़िक पक्ष यह है कि यह जल और सूर्य के मेल से शरीर की प्राकृतिक ऊर्जा को संतुलित करने में मदद करता है।
छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह परिवार और समाज को जोड़ने का एक माध्यम भी है। इस पर्व में पूरा परिवार और समुदाय एकजुट होकर घाटों पर पूजा करने जाता है, जिससे सामाजिक सद्भाव बढ़ता है।
यह पर्व नारी शक्ति और मातृत्व को भी दर्शाता है, क्योंकि इसमें मुख्य रूप से महिलाएँ व्रत रखती हैं और अपने परिवार के कल्याण के लिए तपस्या करती हैं।
छठ पर्व का पर्यावरण संरक्षण में भी विशेष योगदान होता है। इस पूजा के दौरान किसी प्रकार के हानिकारक रसायनों या प्लास्टिक का उपयोग नहीं किया जाता है।
प्रसाद में शुद्ध और प्राकृतिक सामग्री का उपयोग किया जाता है।
पूजा स्थल को स्वच्छ रखा जाता है, जिससे जल प्रदूषण को कम करने में मदद मिलती है।
बाँस की बनी टोकरी और सूप का उपयोग होता है, जो पूरी तरह से प्राकृतिक होते हैं।
चैती छठ केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, श्रद्धा और अनुशासन का एक अद्भुत संगम है। यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति सम्मान और ऊर्जा प्रदान करने वाली शक्तियों के प्रति आभार प्रकट करने की प्रेरणा देता है। जब पूरा समाज एकजुट होकर नदी के तट पर पूजा करता है, तब यह न केवल आध्यात्मिक जागरूकता लाता है, बल्कि सामूहिकता और भाईचारे की भावना को भी प्रबल करता है।इसी प्रकार, चैती छठ भारतीय संस्कृति की महान परंपरा का एक अनमोल रत्न है, जो हमें प्रकृति से जोड़ता है और जीवन को सकारात्मकता और पवित्रता से भर देता है।
छठ पर्व की महिमा अपरंपार है और यह जन-जन में ऊर्जा और विश्वास का संचार करता है।